पाकिस्तान में 48 घंटे में 344 मौतें, खैबर से बलूचिस्तान तक मॉनसून की बाढ़ ने मचाई तबाही

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पाकिस्तान में मॉनसून का कहर: 48 घंटे में 344 मौतें, खैबर से बलूचिस्तान तक तबाही

पड़ोसी देश पाकिस्तान में रविवार को भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ के बाद बचावकर्मियों ने घुटनों तक कीचड़ में काम करते हुए, विशाल चट्टानों और मलबे के नीचे दबे घरों से जीवित बचे लोगों को निकालने की कोशिश की। उत्तरी पाकिस्तान में बाढ़ में कम से कम 344 लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश मौतें खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में हुईं। मॉनसून की बारिश आने वाले दिनों में और भी अधिक खतरा पैदा कर सकती है।

हर साल बाढ़ की तबाही

मॉनसून की बारिश और भूस्खलन के कारण खैबर के कई घर नष्ट हो गए। बुनार इलाके में अकेले 208 लोगों की मौत हुई और 10-12 पूरे गांव पूरी तरह दब गए। एक जिले में 250 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान कम होने के बावजूद, गंभीर सूखे और खतरनाक मॉनसून जैसी जलवायु आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 2010, 2011, 2014, 2016, 2018 और 2019 में देश ने विनाशकारी बाढ़ का सामना किया है।

आर्थिक और मानविक नुकसान

2022 में भी पाकिस्तान में भारी बाढ़ आई थी, जिसमें 33 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए और 40 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ। मॉनसून की निम्न-दबाव प्रणालियों और बंगाल की खाड़ी से आने वाले तूफानों ने पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगित बाल्टिस्तान में बाढ़ की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। 1950 से अब तक पाकिस्तान में 31 विनाशकारी बाढ़ें आईं, जो हर दो साल में औसतन होती हैं।

विशेषज्ञों का कहना

पाकिस्तान में जलवायु जोखिमों के अलावा सरकारी विफलताएं और खराब नीतियां संकट को बढ़ा रही हैं। पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में कई मौतों का कारण नदी किनारे अवैध घर और कमजोर संरचनाएं हैं।

यूएन-हैबिटेट की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि शहरों में तेजी से हो रहे पलायन और आवास की कमी के कारण शहरी आबादी के 50% से अधिक लोग झुग्गियों और अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं।

जलवायु विशेषज्ञ अली तौकीर शेख के अनुसार, क्लीमेट चेंज गंभीर चिंता का विषय है, लेकिन सरकारी निष्क्रियता ने इसके प्रभाव को और बढ़ा दिया है। नदी के किनारे घर बनते रहे, शहरी नियोजन और तैयारी का अभाव रहा, जिससे बाढ़ और अन्य प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी। 2022 की बाढ़ के बाद भी पाकिस्तान में कोई ठोस नीतिगत सुधार नहीं किए गए। विशेषज्ञ इसे “सुधार-विरोधी समाज” बताते हैं, जहां बड़े स्तर पर बदलाव करने की इच्छा नहीं है, जिससे कमजोरियों और तबाही में वृद्धि होती है।

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