भारत बंद और बिहार में चक्का जाम: ट्रेड यूनियनों और विपक्ष ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला
बुधवार को देशभर में ट्रेड यूनियनों के भारत बंद और बिहार में विपक्षी महागठबंधन के चक्का जाम से जनजीवन पर व्यापक असर पड़ने की आशंका है। जहां 10 केंद्रीय श्रमिक संगठनों ने श्रम सुधार, निजीकरण और न्यूनतम मजदूरी जैसे मुद्दों पर 25 करोड़ कर्मचारियों के साथ राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है, वहीं बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान के विरोध में इंडिया गठबंधन ने सड़क पर उतरने का ऐलान किया है।
बिहार में तेजस्वी-राहुल की अगुवाई में विरोध मार्च
बिहार में महागठबंधन का आरोप है कि निर्वाचन आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज गरीब तबकों के पास नहीं हैं, जिससे लाखों नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। इसी के विरोध में आज पटना में आयकर गोलंबर से मुख्य निर्वाचन कार्यालय तक विरोध मार्च निकाला जाएगा।
मार्च की अगुवाई कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव करेंगे। इसमें भाकपा माले, सीपीआई, सीपीएम सहित कई विपक्षी दलों के नेता भाग लेंगे।
चक्का जाम से यातायात व्यवस्था पर असर
महागठबंधन ने चेतावनी दी है कि राज्य भर में चक्का जाम के चलते सड़क यातायात और रेलवे सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों और शहरी रूटों पर विशेष सतर्कता बरती जा रही है। पटना पुलिस ने भीड़ और जाम की आशंका को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।
ट्रेड यूनियनों की प्रमुख मांगें
चारों लेबर कोड को रद्द किया जाए
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण पर रोक
मनरेगा जैसे रोजगार कार्यक्रमों को मज़बूत किया जाए
न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी दी जाए
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) के मुताबिक यह आंदोलन सिर्फ शहरी नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत को भी जोड़ता है। संयुक्त किसान मोर्चा और कृषि मजदूर संगठनों ने भी इस हड़ताल को समर्थन दिया है।
बैंक, बीमा और कोयला खदानों पर असर
ट्रेड यूनियनों ने दावा किया है कि हड़ताल से बैंक, बीमा, डाक, कोयला, निर्माण और परिवहन क्षेत्रों में कामकाज प्रभावित रहेगा। सरकारी और सहकारी बैंकों में सेवाएं ठप रहने की संभावना है। LIC और अन्य बीमा कंपनियों के कार्यालयों में भी कामकाज बंद रहेगा।
सरकार की चुप्पी
अब तक सरकार की ओर से इस हड़ताल और विरोध पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ट्रेड यूनियन नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि देश के आर्थिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल है।
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