अर्मेनिया की संसद में हंगामा: विपक्षी सांसद पर सत्ता पक्ष का हमला, राष्ट्रपति पर तानाशाही के आरोप
अर्मेनिया की संसद मंगलवार को उस वक्त भारी हंगामे का गवाह बनी जब विपक्षी सांसद आर्तुर सर्गस्यान पर सदन के भीतर ही सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने हमला कर दिया। यह घटना उस समय घटी जब सर्गस्यान ने राष्ट्रपति निकोल पशिन्यान की आलोचना करते हुए सदन से बाहर निकलने की कोशिश की।
सर्गस्यान फिलहाल एक आपराधिक मामले में जांच का सामना कर रहे हैं, जिसमें उन पर तख्तापलट की साजिश रचने का आरोप है। हालांकि उन्होंने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है और कहा है कि वह जांच समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार हैं।
मारपीट और अपशब्दों का आरोप, कार्यवाही स्थगित
विपक्षी सांसद क्रिस्टीन वारदान्यान के अनुसार, जैसे ही सर्गस्यान सदन से बाहर जाने लगे, सत्तारूढ़ ‘सिविल कॉन्ट्रैक्ट पार्टी’ के सांसद वाहे गलुम्यान ने उन्हें पीछे से धक्का दिया। इसके बाद अन्य सांसद भी उनकी ओर लपके और हाथापाई शुरू हो गई। आरोप है कि इस दौरान सत्ता पक्ष के सांसदों ने अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया।
स्थिति बिगड़ते देख उपसभापति रूबेन रुबिन्यान को कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
‘तानाशाही बनता जा रहा है अर्मेनिया’: सर्गस्यान
इससे पहले अपने संबोधन में सर्गस्यान ने कहा, “अर्मेनिया अब तानाशाही का गढ़ बन चुका है, जहां फैसले पहले से तय होते हैं और असहमति की कोई जगह नहीं है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार अब विपक्ष ही नहीं, चर्च जैसी संस्थाओं को भी निशाना बना रही है।
राष्ट्रपति निकोल पशिन्यान ने हाल ही में सोशल मीडिया पर चर्च और विपक्षी नेताओं पर तीखी टिप्पणियां की थीं, जिसमें उन्होंने चर्च नेतृत्व को ‘राष्ट्रविरोधी’ और ‘ईसाई विरोधी’ तक बताया था।
विपक्षी नेताओं की इम्यूनिटी खत्म
सत्र के दौरान संसद ने विपक्षी नेता और पूर्व रक्षा मंत्री सैरान ओहान्यान तथा उनके सहयोगी आर्तस्विक मिनास्यान की संसदीय इम्यूनिटी खत्म करने के पक्ष में मतदान किया। इससे उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही का रास्ता खुल गया है, हालांकि अभी तक उन्हें हिरासत में लेने की मांग नहीं की गई है।
सर्गस्यान की इम्यूनिटी को लेकर अंतिम फैसला फिलहाल लंबित है।
बढ़ता राजनीतिक तनाव
यह घटना अर्मेनिया में लगातार बढ़ते राजनीतिक तनाव और असहमति के दमन की ओर इशारा करती है। विपक्ष जहां सरकार पर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मुद्दा बता रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या सर्गस्यान और अन्य विपक्षी नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाइयां लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होंगी या राजनीतिक बदले का उदाहरण बनेंगी।
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