बिहार चुनाव में SIR फैक्टर का असर? 2020 में 85 सीटों पर 10 हजार से कम वोटों से तय हुई थी हार-जीत
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासत गरमा गई है। चुनाव आयोग के इस कदम पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या इसमें बड़े पैमाने पर नाम हटाने से चुनावी परिणाम प्रभावित होंगे। खासकर तब, जब पिछली बार 85 विधानसभा सीटों पर हार-जीत का अंतर 10 हजार वोटों से भी कम था।
राजनीतिक दलों में बेचैनी बढ़ रही है। महागठबंधन के प्रमुख नेता तेजस्वी यादव ने तो चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दे डाली है। वहीं, एनडीए इस प्रक्रिया को पारदर्शी बताते हुए विपक्ष पर भ्रम फैलाने का आरोप लगा रहा है।
SIR में अब तक क्या हुआ?
चुनाव आयोग के मुताबिक, 99% मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरा हो चुका है। बीएलओ और बीएलए की रिपोर्ट में सामने आया कि:
21.6 लाख मतदाता मृत पाए गए।
31.5 लाख लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं।
7 लाख मतदाता एक से अधिक स्थानों पर रजिस्टर्ड हैं।
1 लाख वोटरों का कोई पता नहीं चल पाया है।
कुल मिलाकर, लगभग 61 लाख मतदाताओं को सूची से हटाए जाने की संभावना बन रही है। वहीं, 7.21 करोड़ मतदाताओं (91.32%) के फॉर्म अब तक जमा हो चुके हैं।
2020 चुनाव: नतीजों पर क्या कहता है डाटा?
2020 विधानसभा चुनाव के नतीजे दिखाते हैं कि बिहार में कई सीटों पर बेहद कम अंतर से हार-जीत हुई थी।
85 सीटों पर जीत-हार का अंतर 10 हजार से कम था।
41 सीटों पर यह अंतर 5 से 10 हजार वोटों का था।
32 सीटें ऐसी थीं, जहां उम्मीदवार 5 हजार से कम वोटों से हारे या जीते।
11 सीटों पर तो फासला 500 से 1000 वोट के बीच था।
8 सीटें ऐसी थीं, जहां अंतर 1 हजार से भी कम था।
बेहद करीबी मुकाबलों के कुछ उदाहरण:
हिलसा सीट: जेडीयू ने आरजेडी को सिर्फ 12 वोटों से हराया।
बरबीघा: कांग्रेस प्रत्याशी को 113 वोटों से हार मिली।
भोरे: अंतर सिर्फ 462 वोटों का था।
चकाई: निर्दलीय ने राजद को 581 वोटों से हराया।
रामगढ़: 189 वोटों के मामूली अंतर से जीत।
पिछली बार कौन-कितनी करीबी सीटें जीता?
2020 में जिन 85 करीबी सीटों पर हार-जीत 10 हजार से कम वोटों से तय हुई, उनमें महागठबंधन ने 41 और एनडीए ने 44 सीटें जीतीं:
महागठबंधन:
आरजेडी: 28
कांग्रेस: 10
वाम दल: 2
AIMIM: 1
एनडीए और अन्य:
बीजेपी: 17
जेडीयू: 20
लोजपा: 1
हम: 3
वीआईपी: 2
निर्दलीय: 1
राजनीतिक मायने क्या हैं?
SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाता हटाए जाने से चुनाव नतीजों पर गहरा असर पड़ सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां अंतर बेहद कम रहा था। यही वजह है कि राजनीतिक दल इस प्रक्रिया को लेकर सतर्क और असहज हैं।
संभावना जताई जा रही है कि यदि ये हटाए गए वोटर किसी विशेष समुदाय या दल के समर्थक हुए, तो सीटों की बाज़ी पलट सकती है। यह चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता की अग्निपरीक्षा भी होगी।
बिहार का चुनावी गणित बेहद बारीक संतुलन पर टिका है। ऐसे में मतदाता सूची का SIR केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है—जो 2025 के विधानसभा चुनाव का रुख तय कर सकता है।
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