महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही दरभंगा राज के इतिहास का एक लंबा और गौरवशाली अध्याय बंद हो गया।
लेकिन इस शोक के क्षण में इतिहास की स्मृतियों से वह नाम फिर उभरता है, जिसने कभी इस राजवंश को टूटने से बचाया था—महाराजा माधव सिंह। एक ऐसे शासक, जिन्होंने युद्ध की बजाय विवेक, और तलवार की जगह रणनीति को अपना हथियार बनाया।
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय उपमहाद्वीप में अपने पांव तेजी से जमा रही थी, उस दौर में माधव सिंह ने अंग्रेजी सत्ता को सीधे चुनौती देने के बजाय उसे उसकी ही व्यवस्थाओं में उलझा दिया। महात्मा गांधी के आंदोलनों से करीब 125 वर्ष पहले ही उन्होंने सविनय अवज्ञा और असहयोग जैसी नीतियों का व्यावहारिक प्रयोग कर अपने राज्य की संप्रभुता को बचाए रखा।
बीते सोमवार को दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार को लेकर कुछ समय तक विवाद की स्थिति बनी रही, हालांकि बिहार सरकार के मंत्रियों और स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप से दाह-संस्कार शांतिपूर्वक संपन्न कराया गया।
तिरहुत: संप्रभुता से संघर्ष तक
मिथिला, जिसे ऐतिहासिक रूप से तिरहुत कहा जाता रहा है, मुगल काल तक एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में अस्तित्व में रहा। 1703 ईस्वी में राजा राघव सिंह के समय से इस वंश के शासकों ने ‘सिंह’ उपनाम को अपनाया। लेकिन 1765 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी मिली, तब तिरहुत की संप्रभुता पर सीधा संकट आ गया।
राजस्व न मिलने का बहाना बनाकर कंपनी ने तत्कालीन शासक प्रताप सिंह से राज्य छीन लिया और उन्हें पेंशन पर निर्भर कर दिया। 1775 में जब माधव सिंह सत्ता में आए, तो उन्होंने इस अन्याय का सामना तलवार से नहीं, बल्कि बुद्धि से किया। मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से तिरहुत और धरमपुर के मालिकाना हक का फरमान हासिल कर उन्होंने कंपनी के दावों की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
असहयोग से मिली निर्णायक जीत
1793 में अंग्रेजी प्रशासन ने तिरहुत में स्थायी बंदोबस्त लागू करने का प्रस्ताव रखा, जिसे माधव सिंह ने अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें पूरे तिरहुत पर उनका अधिकार स्वीकार नहीं किया गया था। इसके बाद कंपनी ने फ़याज़ुद्दीन और बरकत खान जैसे बाहरी व्यक्तियों को जमींदारी सौंप दी।
यहीं से माधव सिंह ने अपनी असहयोग नीति को ज़मीन पर उतारा। उन्होंने ऐसी सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियां निर्मित कीं कि नए जमींदार राजस्व वसूली में पूरी तरह विफल हो गए। बिना किसी खुले विद्रोह के अंग्रेजी व्यवस्था को भीतर से पंगु कर दिया गया। अंततः 1800 ईस्वी में ब्रिटिश सत्ता को झुकना पड़ा और माधव सिंह की शर्तों पर ही जमींदारी अधिकार लौटाने पड़े।
अंग्रेजों को प्रशासनिक मोर्चे पर भी मात
इतिहासकार डॉ. शंकर देव झा के अनुसार, माधव सिंह की लड़ाई केवल आर्थिक नहीं थी। जब अंग्रेजों ने दरभंगा को जिला मुख्यालय बनाने की कोशिश की, तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा—“एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं।” परिणामस्वरूप अंग्रेजी प्रशासन को तिरहुत जिले का मुख्यालय दरभंगा से हटाकर मुजफ्फरपुर ले जाना पड़ा।
उन्होंने अपनी स्वतंत्र न्याय व्यवस्था को भी सुरक्षित रखा। 1794 में उनके मुख्य न्यायाधीश सचल मिश्र द्वारा संस्कृत में लिखा गया निर्णय-पत्र आज भी उपलब्ध है, जिसे भारतीय पारंपरिक न्याय प्रणाली का अंतिम लिखित प्रमाण माना जाता है।
महाराजा माधव सिंह की दूरदर्शिता, धैर्य और रणनीतिक समझ ने तिरहुत को अंग्रेजी साम्राज्य में पूरी तरह विलीन होने से रोका और इसे इतिहास में ‘दरभंगा राज’ के रूप में अमर कर दिया।
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