भारत-चीन संबंधों में सुधार के बीच अमेरिका का गलवान दावा: इसके क्या मायने हैं?
भारत और चीन के रिश्ते बीते कुछ महीनों में तेज़ी से पटरी पर लौटते दिख रहे हैं। सीमा पर तनाव कम हुआ है, कूटनीतिक बातचीत बढ़ी है और लोगों के स्तर पर संपर्क भी बहाल हो रहा है। ऐसे समय में अमेरिका का यह दावा कि गलवान घाटी में झड़प के सिर्फ सात दिन बाद चीन ने गुप्त परमाणु परीक्षण किया, कई सवाल खड़े करता है—खासतौर पर तब, जब यह दावा छह साल बाद सामने आया है।
साल 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं। इस हिंसक झड़प में दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए थे और इसके बाद भारत-चीन संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। अब अमेरिका का कहना है कि इस झड़प के तुरंत बाद चीन के इरादे सामान्य नहीं थे।
अमेरिका का दावा क्या है?
अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थॉमस डिनानो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दावा किया है कि अमेरिका के पास ऐसी खुफिया जानकारी है, जिसके मुताबिक चीन ने 22 जून 2020 को—यानी गलवान झड़प के ठीक सात दिन बाद—परमाणु परीक्षण किया था। यह परीक्षण चीन के झिंजियांग क्षेत्र स्थित लोप नुर में किया गया।
डिनानो के अनुसार, चीन ने इस परीक्षण में ‘डिकपलिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया, जिससे भूकंपीय गतिविधियों को दबाया जा सके और अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियों की नजर से परीक्षण बच सके। इस तकनीक में जमीन के भीतर बड़े गड्ढे में विस्फोट किया जाता है, जिससे धरती के कंपन के संकेत कमजोर पड़ जाते हैं।
छह साल बाद अब क्यों किया गया खुलासा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब यह जानकारी अमेरिका के पास पहले से थी, तो इसे अब सामने क्यों लाया गया? विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे मौजूदा वैश्विक रणनीतिक समीकरण हैं।
एक ओर भारत और चीन अपने संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि चीन को लेकर वैश्विक स्तर पर दबाव बना रहे—खासतौर पर परमाणु हथियारों और पारदर्शिता के मुद्दे पर। यह खुलासा ऐसे समय किया गया है, जब भारत-चीन तनाव कम होता दिख रहा है, जिससे इस बयान के राजनीतिक और कूटनीतिक निहितार्थ और गहरे हो जाते हैं।
भारत-चीन रिश्तों में आई नरमी
गलवान विवाद के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग—के बीच अहम बैठक हुई थी। इसके बाद कई सकारात्मक कदम देखने को मिले।
सीधी हवाई सेवाएं बहाल हुईं, कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई, भारत ने चीनी नागरिकों को टूरिस्ट वीजा देना शुरू किया और लोगों के बीच आवाजाही आसान हुई।
हाल ही में भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने भी कहा कि भारत-चीन संबंध “सुधार के एक नए स्तर” पर पहुंच रहे हैं। नई दिल्ली में चीनी न्यू ईयर कार्यक्रम के दौरान दिया गया यह बयान रिश्तों में आई नरमी का संकेत माना गया।
परमाणु संधि और अमेरिका की बड़ी रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम को अमेरिका की परमाणु कूटनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अमेरिका और रूस के बीच आखिरी परमाणु हथियार नियंत्रण संधि हाल ही में खत्म हो चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह संकेत दे चुके हैं कि भविष्य की किसी भी नई परमाणु संधि में चीन को शामिल किया जाना चाहिए।
ऐसे में चीन पर पुराने आरोपों को सार्वजनिक करना अमेरिका की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए वह चीन को वैश्विक परमाणु निगरानी के दायरे में लाना चाहता है।
भारत-चीन संबंधों में सुधार के दौर में अमेरिका का यह दावा केवल अतीत की घटना नहीं है, बल्कि यह भविष्य की वैश्विक राजनीति और सामरिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। सवाल अब यह है कि क्या यह खुलासा भारत-चीन रिश्तों पर असर डालेगा, या फिर दोनों देश इसे एक बाहरी कूटनीतिक दबाव के तौर पर ही देखेंगे।
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