भारत में त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ या किसी एक रस्म तक सीमित नहीं होते।
अलग-अलग राज्यों और समुदायों में एक ही त्योहार को मनाने का तरीका बदल जाता है। रक्षाबंधन भी इसका एक खूबसूरत उदाहरण है। भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित इस दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में कई खास परंपराएं निभाई जाती हैं। सावन की पूर्णिमा पर कहीं समुद्र की पूजा कर नारियल चढ़ाया जाता है, कहीं भगवान शिव की आराधना होती है तो कहीं वेदों के अध्ययन और ऋषियों के सम्मान से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। आइए जानते हैं रक्षाबंधन के दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाई जाने वाली इन परंपराओं के बारे में।
नारली पूर्णिमा: समुद्र को चढ़ाया जाता है नारियल
महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात के तटीय इलाकों में रक्षाबंधन के दिन नारली पूर्णिमा मनाई जाती है। यह खास तौर पर मछुआरा समुदाय के लिए महत्वपूर्ण त्योहार है।
इस दिन मछुआरे समुद्र की पूजा करते हैं और नारियल अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र देव की पूजा करने से समुद्र शांत रहता है और नाविकों की यात्रा सुरक्षित होती है। पूजा के बाद कई जगह मछली पकड़ने के नए मौसम की शुरुआत भी की जाती है।
संस्कृत दिवस: ज्ञान और भाषा को समर्पित दिन
सावन पूर्णिमा को संस्कृत दिवस भी मनाया जाता है। इसका संबंध भारत की प्राचीन शिक्षा और ज्ञान परंपरा से माना जाता है।
मान्यता है कि प्राचीन काल में सावन पूर्णिमा के अवसर पर ऋषि-मुनि वेदों और शास्त्रों के अध्ययन की शुरुआत करते थे। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संस्कृत दिवस के जरिए संस्कृत भाषा, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है।
लुम्बा राखी: भाभी की कलाई नहीं, चूड़ी पर बांधी जाती है राखी
राजस्थान की मारवाड़ी संस्कृति में रक्षाबंधन से जुड़ी लुम्बा राखी की परंपरा काफी खास है। इसमें बहनें सिर्फ भाई को ही राखी नहीं बांधतीं, बल्कि अपनी भाभी के लिए भी राखी लेकर आती हैं।
लुम्बा राखी को कलाई पर बांधने के बजाय चूड़ी या कंगन पर लगाया जाता है। यह परंपरा परिवार में भाभी की भूमिका और उनके सम्मान को दर्शाती है। खासतौर पर मारवाड़ी परिवारों में आज भी इस रस्म को रक्षाबंधन का अहम हिस्सा माना जाता है।
पवित्रोपना: सावन पूर्णिमा पर शिव आराधना
गुजरात में सावन पूर्णिमा का दिन भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए भी जाना जाता है। इस दिन पवित्रोपना की परंपरा निभाई जाती है।
सावन को भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है, इसलिए पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान भगवान शिव को पवित्रोपना अर्पित किया जाता है और सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक शुद्धि की कामना की जाती है।
उपाकर्म: वेदों के अध्ययन से जुड़ा संस्कार
सावन पूर्णिमा पर उपाकर्म संस्कार निभाने की भी परंपरा है। उत्तर भारत में इसे ‘ऋषि तर्पण’ और दक्षिण भारत में ‘अवनि अवित्तम’ के नाम से जाना जाता है।
यह संस्कार वेदों के अध्ययन और ऋषि परंपरा से जुड़ा हुआ है। इस दिन ऋषियों को श्रद्धांजलि दी जाती है और वेदों के अध्ययन की शुरुआत या पुनः शुरुआत की जाती है। कई समुदायों में इसी अवसर पर जनेऊ बदलने की परंपरा भी निभाई जाती है।
इस तरह रक्षाबंधन सिर्फ भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित त्योहार नहीं है। सावन पूर्णिमा से जुड़ी अलग-अलग परंपराएं भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को भी दर्शाती हैं। यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह दिन अलग रंग और अलग रस्मों के साथ मनाया जाता है।
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