बिहार चुनावों में फिर छाया बाहुबल का साया, मोकामा हत्याकांड ने बढ़ाई सियासी तपिश — क्या इस बार वोटर अपराध के खिलाफ खड़ा होगा?
पटना: मोकामा हत्याकांड ने बिहार विधानसभा चुनावों के बीच एक बार फिर अपराध और राजनीति के गठजोड़ को सुर्खियों में ला दिया है। राज्य में विभिन्न दलों द्वारा अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों या उनके परिजनों को टिकट देने से इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया है।
आरके सिंह की अपील बनी चर्चा का केंद्र
वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह का दीपावली पर दिया गया बयान अब मोकामा की घटना के बाद नए सिरे से चर्चा में है। उन्होंने मतदाताओं से जात-पात से ऊपर उठकर अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट करने की अपील की थी।
उन्होंने कहा था —
“किसी भी आपराधिक या भ्रष्ट व्यक्ति को वोट न दें, चाहे वह आपकी जाति का ही क्यों न हो। अगर सारे प्रत्याशी अपराधी हैं, तो ‘नोटा’ दबाना बेहतर है — क्योंकि इन लोगों को वोट करना, खुद को डुबाने जैसा है।”
बाहुबली उम्मीदवारों पर आरके सिंह के निशाने
आरके सिंह ने एनडीए और आरजेडी दोनों गठबंधनों के कई प्रत्याशियों को निशाने पर लिया, जो बिहार की राजनीति में बाहुबली प्रभाव की गहराई को उजागर करता है।
मोकामा: एनडीए के अनंत सिंह और आरजेडी के सूरजभान सिंह की पत्नी — सिंह ने अनंत सिंह को “1985 का उपद्रवी” और सूरजभान को “बिहार का नंबर 1 डॉन” बताया।
नवादा: एनडीए प्रत्याशी राजबल्लभ यादव की पत्नी, जो POCSO एक्ट के तहत गंभीर आरोपों में घिरे पूर्व विधायक की पत्नी हैं।
रघुनाथपुर: आरजेडी प्रत्याशी शाहबुद्दीन के बेटे ओसामा।
तारापुर, जगदीशपुर, सन्देश: एनडीए और आरजेडी दोनों दलों के कई उम्मीदवारों पर हत्या, माफियागिरी और भ्रष्टाचार के आरोप।
“मुद्दाविहीन चुनाव में अपराध ने ली जगह”
राजनीतिक विश्लेषक पुष्यमित्र का कहना है कि “इस बार के चुनाव में कोई ठोस मुद्दा नहीं था, लेकिन अपराध और दबंगई का सवाल भीतर ही भीतर सुलग रहा था। मोकामा की घटना ने इसे सतह पर ला दिया।” उन्होंने जोड़ा, “राजनीतिक दल अपराध के खिलाफ तो बातें करते हैं, पर टिकट देते समय उन्हीं बाहुबलियों पर भरोसा करते हैं। यह उनका दोहरा रवैया है।”
पुलिस और आयोग पर सवाल
मोकामा हत्याकांड ने पुलिस-प्रशासन और चुनाव आयोग की तैयारी पर भी सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बाहुबलियों के प्रभाव वाले इलाकों में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगा।
जनता की निगाहें वोटर पर
सोशल मीडिया पर आरके सिंह का बयान वायरल है, और लोग बाहुबली राजनीति पर नाराजगी जता रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद मुकेश के अनुसार, “बिहार का चुनावी इतिहास हमेशा हिंसा और जातीय समीकरणों से भरा रहा है। अब असली परीक्षा यह है कि क्या इस बार का वोटर जाति की राजनीति से ऊपर उठकर अपराध-मुक्त शासन के लिए वोट देगा?”
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