जयंती विशेष: ‘केलवा के पात’ से पद्म विभूषण तक—शारदा सिन्हा की संगीत यात्रा

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जयंती विशेष: शारदा सिन्हा – लोकगीतों की अमर आवाज़

छठ पूजा की सुबह जब घाट पर सूर्य की लालिमा बिखरती है, तो शारदा सिन्हा के गीत ‘केलवा के पात पर उगलन सूरजमल’ श्रद्धालुओं के कानों में गूंजते हैं। शाम को उनका ‘सुनअ छठी माई’ गीत छठ घाटों को भक्ति से भर देता है। उनके गीत सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि छठ महापर्व की आत्मा हैं।

साल 1952 में बिहार के सुपौल जिले के हुलास गांव में जन्मीं शारदा सिन्हा ने साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर लोकसंगीत को नई ऊंचाई दी। ससुराल बेगूसराय के सिहमा गांव में उनका झुकाव मैथिली लोकगीतों की ओर बढ़ा, जिसने उन्हें पहचान दिलाई।

शारदा सिन्हा ने भोजपुरी, मैथिली, मगही और हिंदी गीतों के साथ बॉलीवुड में भी अपनी छाप छोड़ी। ‘कहे तो से सजना’ (मैंने प्यार किया), ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ और ‘चारफुटिया छोकरे’ उनके सुरों की पहचान हैं। 2016 में उन्होंने ‘सुपवा ना मिले माई’ और ‘पहिले पहिल छठी मैया’ जैसे गीतों से छठ महापर्व को नई ताजगी दी।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1991 में पद्मश्री, 2018 में पद्म भूषण और 2025 में मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। शारदा सिन्हा आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज हर छठ घाट पर गूंजती है और उनके गीत छठ महापर्व को अमर बनाते हैं।

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