“डोनाल्ड ट्रंप ने ओबामा-युग की ईरान डील को ठुकराया, नई शर्तों पर जोर”

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ट्रंप का सख्त रुख: ईरान से ओबामा जैसी डील नहीं होगी, परमाणु संयंत्र खत्म करने की शर्त

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के साथ किसी भी प्रकार की परमाणु वार्ता केवल तभी संभव होगी जब तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करने पर सहमत होगा। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा किए गए 2015 के परमाणु समझौते को “मूर्खतापूर्ण” बताते हुए कहा कि वह वैसी कोई ढील ईरान को नहीं देंगे जिससे उसे परमाणु हथियार विकसित करने का अवसर मिले।

ईरान की शर्त: पहले सुरक्षा की गारंटी दे अमेरिका
दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री साजिद तख्त रवांची ने कहा है कि उनका देश अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन इससे पहले वह इस बात की गारंटी चाहता है कि अमेरिकी सेना ईरान पर दोबारा हमला नहीं करेगी। उन्होंने यह बयान ऐसे समय में दिया है जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है।

सीआईए और पेंटागन की राय में मतभेद
इस मुद्दे पर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों में भी मतभेद नजर आ रहे हैं। सीआईए प्रमुख जान रेटक्लिफ ने अमेरिकी सांसदों के समक्ष बताया कि हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों पीछे चला गया है। हालांकि, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी कार्यक्रम पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि उसकी कुछ क्षमताएं अब भी बरकरार हैं।

ईरान-इजरायल संघर्ष: भारी मानवीय नुकसान
इस बीच ईरान और इजरायल के बीच चले 12 दिवसीय संघर्ष में भारी जानमाल का नुकसान हुआ है। ईरानी न्यायपालिका के प्रवक्ता असगर जहांगीर ने बताया कि इस संघर्ष में 935 ईरानी नागरिकों की मौत हुई, जिनमें 38 बच्चे और 132 महिलाएं शामिल थीं। राजधानी तेहरान की एविन जेल में हुए हमले में अकेले 79 लोगों की मौत हुई। वहीं, इजरायल में ईरानी हमलों में 28 लोग मारे गए हैं।

IAEA पर टिप्पणी को लेकर यूरोप नाराज़
ईरान की कट्टरपंथी मीडिया द्वारा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख रफाएल ग्रोसी के खिलाफ हिंसक भाषा का इस्तेमाल किए जाने पर यूरोपीय देशों ने कड़ी आपत्ति जताई है। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ग्रोसी को “इजरायली एजेंट” कहकर फांसी की धमकी देना अस्वीकार्य है। इन देशों ने IAEA के प्रति पूर्ण समर्थन जताया है और ईरान से आग्रह किया है कि वह IAEA के प्रति अपने रुख में बदलाव लाए।

गौरतलब है कि 2015 में हुए बहुपक्षीय परमाणु समझौते के पक्षकारों में यही तीनों यूरोपीय देश शामिल थे। भले ही अमेरिका अब इस समझौते से अलग हो चुका है, यह अब भी प्रभावी बना हुआ है।

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