अपराध से विधानसभा तक: अरुण गवली की सियासी ढाल।
महाराष्ट्र की राजनीति में अपराधियों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 विधानसभा चुनाव के बाद बनी मौजूदा विधानसभा में 118 विधायक यानी 41% ऐसे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं पर अत्याचार और यहां तक कि बलात्कार जैसे संगीन आरोप शामिल हैं। यही कारण है कि जनता ने कई बार यह नजारा देखा है कि जिन लोगों का कानून से छत्तीस का आंकड़ा रहा, वही विधानमंडल की चौखट पर शपथ लेते नजर आए।
इसी सिलसिले में सबसे बड़ा नाम है गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली का। हाल ही में नागपुर जेल से जमानत पर रिहा हुए गवली का मुंबई की दगडी चाली में जोरदार स्वागत हुआ। शिवसैनिक की हत्या के केस में उम्रकैद की सजा पाए गवली को इसी मामले में जमानत मिली है।
जब अपराधियों ने थामा सत्ता का रास्ता
90 के दशक में उल्हासनगर के कलाणी और वसई-विरार के ठाकुर जैसे कई लोग सत्ता की सीढ़ियां चढ़े। उन्होंने साबित किया कि राजनीति में कदम रखने से न सिर्फ कानूनी शिकंजे से राहत मिल सकती है बल्कि सियासी ताकत भी हासिल होती है। उन्हीं के नक्शेकदम पर अरुण गवली ने भी राजनीति की राह पकड़ी। उस दौर में मुंबई में पांच बड़ी गैंग सक्रिय थीं और गवली उनमें से एक का सरगना था।
एनकाउंटर का डर और राजनीति का रास्ता
जब मुंबई पुलिस ने गैंगवार खत्म करने का बीड़ा उठाया, तब कई कुख्यात नाम मुठभेड़ों में ढेर हुए। गवली को एहसास हुआ कि अगर उसे जिंदा रहना है तो राजनीति ही ‘बुलेट प्रूफ जैकेट’ बन सकती है। उसने अपनी पार्टी अखिल भारतीय सेना बनाई और 2004 में लोकसभा चुनाव लड़ा। भले ही जीत नहीं मिली, लेकिन 93,000 वोट हासिल कर गवली ने सबको चौंका दिया। उसी साल विधानसभा चुनाव में उसने जीत दर्ज की और थाने में मुर्गा बनने वाला शख्स विधायक की कुर्सी तक पहुंच गया।
दगडी चाल से विधानभवन तक का सफर
गवली की पहली शपथ-ग्रहण यात्रा किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं थी। मिनी बस में सफर करते हुए, चारों ओर मोटरसाइकिलों पर तैनात समर्थक, जिन्हें वह अपने “डैडी” कहकर पुकारे जाने का आदी था। ये ज्यादातर मिल मजदूर परिवारों से आए युवक थे जिनका भरण-पोषण गवली ने अपने काले धन से सुनिश्चित किया।
पुलिस की पैनी नजर इस काफिले पर भी थी। क्राइम ब्रांच के अधिकारी सादे कपड़ों में गवली के हर कदम पर नजर रख रहे थे। आखिरकार, विधान भवन के करीब पहुंचते ही गवली ने मिनी बस छोड़ दी और पहले से इंतजार कर रही काली मर्सिडीज में बैठ गया। यह कदम महज सफर बदलने का नहीं था, बल्कि ताकत और रुतबे का संदेश देने का तरीका था — कि अब गवली केवल गैंगस्टर नहीं रहा, बल्कि सत्ता के खेल का खिलाड़ी बन गया है।
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