हिमालय से होते हुए राजनीति की ऊंचाइयों तक: दलाई लामा, भारत और चीन की बदलती रणनीति

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दलाई लामा की ऐतिहासिक पलायन गाथा: एक निमंत्रण, एक खतरा और भारत-चीन संबंधों का निर्णायक मोड़

मार्च 1959। ल्हासा की सड़कों पर तनाव था, आसमान में तोपों की गूंज और चीनी सैनिकों की चहलकदमी। इसी घातक माहौल में, एक 23 वर्षीय युवक चुपचाप भिक्षु सैनिक की वर्दी पहनकर नोरबुलिंगका महल से बाहर निकल गया। यह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि तिब्बत के आध्यात्मिक और राजनीतिक प्रमुख 14वें दलाई लामा थे।

उनकी यह रातों-रात की गुप्त यात्रा न केवल तिब्बती इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल हुई, बल्कि भारत-चीन संबंधों की दिशा भी हमेशा के लिए बदल गई।

❖ एक निमंत्रण जो बन गया चेतावनी
1950 में तिब्बत पर चीन के सैन्य कब्ज़े के बाद तिब्बती असंतोष धीरे-धीरे उबाल पर आ रहा था। चीन ने 1951 के 17-सूत्री समझौते में तिब्बत को सीमित स्वायत्तता देने का वादा किया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह वादा टूटता गया।

फरवरी 1959 में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब एक चीनी जनरल ने दलाई लामा को एक सैन्य कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया, वह भी बिना किसी सुरक्षा के। तिब्बती प्रतिष्ठान में यह खबर खतरे की घंटी बन गई। आशंका थी कि यह दलाई लामा के अपहरण या हत्या की साज़िश हो सकती है।

10 मार्च को, लाखों तिब्बतियों ने दलाई लामा की सुरक्षा के लिए महल के चारों ओर मानव श्रृंखला बनाई। विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और ल्हासा विद्रोह ने आकार ले लिया। चीनी सेना ने महल पर बमबारी शुरू की — और यही वह क्षण था जब पलायन तय हो गया।

❖ रात के साए में शुरू हुई यात्रा
17 मार्च 1959 को, रात के अंधेरे में, दलाई लामा अपने करीबी साथियों के साथ गुप्त रूप से रवाना हो गए। उनके पास कोई नक्शा नहीं था, कोई पुख्ता रास्ता नहीं — सिर्फ विश्वास, साहस और कुछ गाइड जिनकी जानकारी ही उनकी GPS थी।

13 दिनों तक उन्होंने हिमालय के बर्फीले दर्रे पार किए, चीनी सेना की निगरानी से बचते रहे और अंततः 31 मार्च को अरुणाचल प्रदेश के खेंजीमाने दर्रे के ज़रिए भारत में प्रवेश किया।

❖ भारत ने दिया मानवीय आसरा, चीन भड़क उठा
भारत सरकार के लिए यह क्षण अत्यंत संवेदनशील था। एक ओर मानवीय दृष्टिकोण था, दूसरी ओर चीन की संभावित नाराज़गी। लेकिन अंततः प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 3 अप्रैल को दलाई लामा को शरण देने का फैसला किया।

18 अप्रैल को तेजपुर में दलाई लामा ने पहली बार भारत की ज़मीन से सार्वजनिक रूप से चीन की कार्रवाई की निंदा की और स्पष्ट किया कि वे अपनी मर्जी से आए हैं, किसी दबाव में नहीं।

❖ धर्मशाला में बना निर्वासित तिब्बत
पहले मसूरी और फिर धर्मशाला को दलाई लामा ने अपना नया ठिकाना बनाया। यहीं उन्होंने तिब्बती निर्वासित सरकार, स्कूल, मठ और सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना की। धर्मशाला का मैकलियोडगंज अब ‘लिटिल ल्हासा’ के नाम से जाना जाता है।

उनकी शांति, संवाद और अहिंसा की नीति को वैश्विक पहचान मिली और 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज, 90 वर्ष की उम्र में, वे अभी भी यहीं रहते हैं।

❖ भारत-चीन संबंधों में स्थायी दरार
भारत का यह मानवीय निर्णय चीन को बेहद नागवार गुज़रा। बीजिंग ने भारत पर तिब्बत मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया और यह घटनाक्रम 1962 के भारत-चीन युद्ध की भूमिका तय करने वाले प्रमुख कारकों में से एक बन गया।

दलाई लामा का भारत में रहना आज भी भारत-चीन संबंधों में संवेदनशील मुद्दा है। चीन तिब्बत को अपना आंतरिक मामला मानता है, जबकि भारत ने दलाई लामा को कभी राजनीतिक मंच नहीं दिया, लेकिन नैतिक समर्थन हमेशा बरकरार रखा।

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