सुप्रीम कोर्ट में आज बिहार की वोटर लिस्ट विवाद पर सुनवाई, जानिए दोनों पक्ष क्या कह रहे हैं

7

बिहार वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, विपक्ष और आयोग आमने-सामने

बिहार में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होनी है। चुनाव आयोग की इस पहल को लेकर विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई है, जबकि कुछ याचिकाकर्ता इसे जरूरी सुधार की दिशा में कदम मानते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं, गुरुवार को इस मामले की सुनवाई करेगी।

मामला क्या है?
विपक्षी दलों और नागरिक समूहों का आरोप है कि बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर मतदाताओं से दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जिनमें आधार और वोटर आईडी शामिल नहीं हैं। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया मनमानी और भेदभावपूर्ण है, जिससे लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां
सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अजमल और रूपेश कुमार द्वारा दायर याचिका में निर्वाचन आयोग के इस कदम को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया गया है। याचिका के अनुसार, जन्म, निवास और नागरिकता से संबंधित कठोर दस्तावेजों की अनिवार्यता मतदाताओं के अधिकारों को बाधित करती है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है।

समर्थन में दलील
वहीं, अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस प्रक्रिया का समर्थन करते हुए अलग याचिका दाखिल की है। उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण तेज़ी से करने का निर्देश दिया जाए। उनका कहना है कि यह ज़रूरी है ताकि मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिक ही शामिल रहें और अवैध घुसपैठिए लोकतंत्र को प्रभावित न कर सकें।

कांग्रेस और विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया “त्रुटिपूर्ण और विनाशकारी” है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। उन्होंने कहा कि दुर्भावनापूर्ण तरीके से चल रही इस कार्रवाई के कारण बड़ी संख्या में वैध मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। कांग्रेस समेत 10 विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के इस कदम का विरोध किया है।

पार्टी के आधिकारिक बयान में इसे मतदाता अधिकारों के “संगठित हनन” की कोशिश बताया गया है और कहा गया है कि यह सरकार और आयोग द्वारा संयुक्त रूप से रची गई “वोट काटने की साजिश” है।

अगली दिशा
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि क्या यह पुनरीक्षण संविधान के अनुरूप है या लाखों मतदाताओं के अधिकारों को खतरे में डालने वाला कदम।

Comments are closed.