लॉरेंस बिश्नोई का क्रिमिनल इकोसिस्टम: शूटर, IT सेल और लीगल टीम का पूरा ब्लूप्रिंट

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भारत का कुख्यात गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई 2016 में दोबारा गिरफ्तार होने के बाद से लगातार जेल में बंद है।

उसे पहली बार 2014 में राजस्थान में गिरफ्तार कर भरतपुर जेल भेजा गया था, लेकिन मोहाली में पेशी के दौरान वह फरार हो गया था। दो वर्ष बाद दोबारा गिरफ्त में आने के बाद से वह जेल के भीतर रहकर ही न केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देता रहा है। यह रिपोर्ट बताती है कि उसका गैंग आखिर कैसे काम करता है।

भाई की गिरफ्तारी के बाद भी नेटवर्क सक्रिय

हाल ही में उसका भाई अनमोल बिश्नोई अमेरिका से भारत लौटने के बाद गिरफ्तार हुआ, जिसके बाद कहा जाने लगा कि बिश्नोई गैंग कमजोर पड़ चुका है। लेकिन 1 दिसंबर को चंडीगढ़ में इंदरप्रीत पैरी की हत्या ने साबित कर दिया कि गैंग की ऑपरेशनल क्षमताएं अब भी बरकरार हैं।

रोहित गोदारा, गोल्डी बराड़, शहजाद भट्टी जैसे लॉरेंस के कई पुराने साथी अब उसके दुश्मन बने बैठे हैं. लेकिन इन कुख्यात गैंगस्टरों की दुश्मनी के बाद भी लॉरेंस गैंग अपने मंसूबों को पूरा कर रहा है.

कॉरपोरेट स्टाइल में चलता है बिश्नोई गैंग

जांच एजेंसियों और पुलिस अधिकारियों के अनुसार, लॉरेंस बिश्नोई का पूरा नेटवर्क डिजिटल और वर्चुअल मॉडल पर चलता है। गैंग का ढांचा किसी कॉरपोरेट कंपनी जैसा है, जिसमें रेकी करने वाले, आर्म्स सप्लायर, शूटर, IT सेल और लीगल टीम तक मौजूद हैं।

गैंग में शामिल हर व्यक्ति केवल अपने हिस्से का काम जानता है। उसे अन्य सदस्यों या बड़े प्लान के बारे में लगभग कोई जानकारी नहीं होती, जिससे गैंग का ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

लगभग 1000 सदस्यों का संगठित नेटवर्क

गैंग में करीब 1000 सक्रिय सदस्य बताए जाते हैं—शार्प शूटर, अपराधी, कैरियर, सप्लायर, रेकी पर्सन, लॉजिस्टिक सपोर्ट ब्वॉय, शेल्टर मेन और सोशल मीडिया ऑपरेटर्स। हर टीम का काम स्पष्ट रूप से बाँटा गया है और कम्युनिकेशन बेहद सीमित चैनलों के जरिए होता है।

हर सदस्य केवल एक व्यक्ति को जानता है

किसी भी ऑपरेशन में शामिल लोग सिर्फ अपने ‘अगले लिंक’ को जानते हैं। पूरी चेन को जानने का अधिकार किसी के पास नहीं होता। किसी टारगेट के लिए अलग-अलग टास्क—वसूली, रेकी, लॉजिस्टिक, हथियारों का इंतजाम, शेल्टर, फंडिंग और बाद में कानूनी मदद—अलग टीमों में बांटे जाते हैं।

गैंग के सारे टारगेट वर्चुअल नंबरों से ऑडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए तय होते है. लॉरेंस कंपनी का हेड ऑफ द पर्सन है, यानी मुखिया है.

सिग्नल ऐप से होती है सुरक्षित बातचीत

अधिकांश ऑपरेशन सिग्नल ऐप पर वर्चुअल नंबरों के जरिए प्लान किए जाते हैं। कई बार किलिंग के वक्त मौजूद गैंग मेंबर भी एक-दूसरे को नहीं जानते, ताकि गिरफ्तारी की स्थिति में गैंग का बड़ा नेटवर्क उजागर न हो।

युवाओं को भावनात्मक रूप से जोड़ता है लॉरेंस

बिश्नोई युवाओं को भावनात्मक स्तर पर जोड़कर अपने गैंग में शामिल करता है। बताया जाता है कि उसके करीब 700 सक्रिय गैंगस्टर और शार्प शूटर देश के अलग-अलग राज्यों में फैले हैं।

आर्थिक मदद से बनाए रखता है पकड़

लॉरेंस हर सदस्य को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन गैंग से जुड़े किसी भी व्यक्ति को परिवार या आर्थिक संकट आने पर वह पैसे और जरूरी मदद उपलब्ध कराता है। यही रणनीति गैंग के प्रति सदस्यों की वफादारी बनाए रखती है।

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