माओवादी मिट रहे, झीरम के घाव अभी भी हरे; कब मिलेगा घाटी में मारे गए 27 लोगों को न्याय

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छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादियों का सफाया जारी है, लेकिन झीरम घाटी हमले के 12 साल बाद भी पीड़ितों के स्वजन के घाव अभी भी हरे हैं।

25 मई, 2013 के नृशंस हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेता मारे गए थे, जिसकी जांच अब भी अधूरी है। पीड़ितों के स्वजन न्याय और पूरी सच्चाई जानने का इंतजार कर रहे हैं।

माओवादियों ने मारे थे शीर्ष कांग्रेसी नेता सहित 27 लोग
मालूम हो कि हाल में मास्टरमाइंड बसव राजू सहित कई बड़े इनामी माओवादी ढेर हुए हैं। सुकमा जिले के झीरम घाटी में माओवादियों ने वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सहित 27 लोगों की हत्या कर दी थी।

भूपेश सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहे उमेश पटेल ने हमले में पिता व बड़े भाई को खो दिया था। उमेश कहते हैं कि जब भी झीरम कांड की बरसी आती हैं, उनके घाव फिर से हरे हो जाते हैं। बार-बार इस बात को कुरेदना सही नहीं मानते।

कुछ देर की चुप्पी के बाद वे फिर से कहते हैं, घटना ने उनका पूरा जीवन बदल दिया। वह कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे, पर पिता और भाई की राजनीतिक विरासत संभालना उनकी मजबूरी बनी गई।

महेंद्र कर्मा के प्रति सबसे अधिक क्रूरता दिखाई
मानते हैं कि भले ही घटना की जांच रिपोर्ट आने में अब बहुत देर हो चुकी है, पर उम्मीद है कि एक दिन झीरम का सच जरूर सामने आएगा। झीरम की घटना में माओवादियों ने बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा के प्रति सबसे अधिक क्रूरता दिखाई थी। उन्हें बस्तर टाइगर क्यों कहा जाता है, घटना ने सिद्ध कर दिया था।

माओवादी कर्मा से बहुत नाराज थे
दरअसल महेंद्र कर्मा ने माओवादियों के विरुद्ध वर्ष 2005 में सलवा जुडूम आंदोलन की अगुआई की थी। यही कारण था कि माओवादी कर्मा से बहुत नाराज थे। वहां पहुंचे माओवादी बार-बार पूछ रहे थे, कर्मा कौन है? तब महेंद्र कर्मा गाड़ी से उतरे और माओवादियों से कहा कि- ”मैं कर्मा हूं, सभी को जाने दो, जो करना है मेरे साथ करो”।

12 वर्ष बाद अब निष्पक्ष जांच की संभावना
इसके बाद माओवादियों ने उन्हें जंगल में ले जाकर सौ से अधिक गोलियां मारी थीं। उनके शव पर कूदकर अपनी बर्बरता का जश्न मनाया। उनके बेटे छविंद्र कर्मा घटनाक्रम के पीछे राजनीतिक षड्यंत्र बताते हैं।
कहते है कि कर्मा जी उस समय सीएम के दावेदार थे, यह बात भी कई लोगों को खटक रही थी। 12 वर्ष बाद अब निष्पक्ष जांच की संभावना नहीं देख पा रहे हैं।

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