देश में पहली बार CEC पर महाभियोग की तैयारी, जानें विपक्ष पर लगाए 5 गंभीर आरोप

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भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही है।

विपक्ष ने इसके लिए व्यापक समर्थन जुटा लिया है और सूत्रों के मुताबिक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नोटिस पर 190 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। संभावना है कि शुक्रवार को संसद के किसी एक सदन में यह नोटिस पेश किया जा सकता है।

इस पहल की अगुवाई पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी कर रही हैं। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने भी इसका समर्थन किया है। विपक्ष का आरोप है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं, खासकर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर।

190 से ज्यादा सांसदों का समर्थन

सूत्रों के अनुसार महाभियोग नोटिस पर लोकसभा और राज्यसभा के 190 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें लोकसभा के करीब 130 और राज्यसभा के 60 से ज्यादा सांसद शामिल बताए जा रहे हैं। जरूरी संख्या पूरी होने के बाद भी कई सांसदों ने इस प्रस्ताव के समर्थन में हस्ताक्षर किए। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नोटिस लोकसभा में पेश होगा या राज्यसभा में।

क्या है CEC को हटाने का नियम

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी ही होती है। इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ नोटिस देना जरूरी होता है। प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।

यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित की जाती है। आमतौर पर इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ को शामिल किया जाता है।

जांच रिपोर्ट के बाद दोनों सदनों में प्रस्ताव पर मतदान होता है। इसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है—यानी सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन।

CEC पर लगाए गए प्रमुख आरोप

सूत्रों के मुताबिक महाभियोग नोटिस में मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण का आरोप शामिल है। इसके अलावा चुनावी अनियमितताओं की जांच में बाधा डालने और बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के आरोप भी लगाए गए हैं।

विपक्ष का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया के जरिए वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई, जिससे सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंच सकता है। तृणमूल कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने पार्टी नेताओं के साथ दुर्व्यवहार किया।

SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष पहले से ही चुनाव आयोग पर सवाल उठाता रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए कई राज्यों में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

आगे क्या होगा

अगर संसद में महाभियोग का नोटिस पेश होता है, तो नियमों के मुताबिक उस पर कम से कम 14 दिन बाद चर्चा हो सकती है। इसके बाद जांच और आगे की प्रक्रिया शुरू होती है।

फिलहाल यह देखना अहम होगा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ यह प्रस्ताव मौजूदा बजट सत्र में आगे बढ़ पाता है या नहीं। संसद का बजट सत्र 2 अप्रैल तक चलना है।

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