दिल्ली और पूरे एनसीआर के लिए जीवनरेखा मानी जाने वाली अरावली पर्वतमाला को खनन माफिया तेजी से खत्म कर रहा है।
अब तक अरावली के 31 पहाड़ पूरी तरह निगले जा चुके हैं, जबकि कई अन्य पहाड़ों का अस्तित्व भी खतरे में है। इसका नतीजा यह है कि राजस्थान से उठने वाली धूल भरी हवाएं बिना किसी रुकावट के दिल्ली तक पहुंचने लगी हैं, जिससे वायु प्रदूषण लगातार गंभीर होता जा रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अरावली की नई परिभाषा लागू कर दी गई, तो 90 प्रतिशत से अधिक पहाड़ समाप्त हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में राजस्थान का मरुस्थल धीरे-धीरे दिल्ली के बेहद करीब पहुंच जाएगा। हरियाली खत्म होगी और एनसीआर में सांस लेना और मुश्किल हो जाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर के पीछे अरावली का क्षरण एक बड़ा कारण है।
कभी बाघों का बसेरा थी अरावली
1970 के दशक तक अरावली क्षेत्र में बाघों की मौजूदगी दर्ज की जाती थी। लेकिन समय के साथ भूमाफिया और खनन माफिया इस कदर सक्रिय हुए कि पहाड़ों के साथ-साथ वन्यजीव भी गायब होते चले गए। आज हालात यह हैं कि केवल कुछ तेंदुए, लकड़बग्घे, हिरण, नीलगाय और खरगोश ही बचे हैं।
होडल के पास स्थित अरावली की वादियां, जहां कभी लोग घूमने आया करते थे, अब पूरी तरह उजड़ चुकी हैं।
कहां-कहां मिट गए पहाड़
अरावली को सबसे ज्यादा नुकसान हरियाणा और राजस्थान से सटे इलाकों में हुआ है।
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नारनौल जिले के नांगल दरगु के पास कई पहाड़ पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
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गुरुग्राम में सोहना से आगे तीन से चार पहाड़ों का कोई नामोनिशान नहीं बचा।
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महेंद्रगढ़ के ख्वासपुर क्षेत्र में पहाड़ लगभग समाप्त हो चुके हैं।
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नूंह जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां तावड़ू और आसपास के इलाकों में कई पहाड़ खत्म हो चुके हैं और कई समाप्ति की कगार पर हैं।
कुछ ही सालों में मरुस्थल दिल्ली के पास
पर्यावरणविदों की चेतावनी है कि जिस रफ्तार से अरावली नष्ट हो रही है, अगर यही स्थिति रही तो कुछ ही वर्षों में मरुस्थल दिल्ली के नजदीक पहुंच जाएगा। अरावली की हरियाली धूल और मिट्टी को सोखकर हवा में जाने से रोकती थी। पहाड़ और जंगल खत्म होने से धूल सीधे वातावरण में घुल रही है, जिससे प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है।
कहां थी खनन की वैध अनुमति
पर्यावरणविद और सेवानिवृत्त वन संरक्षक डॉ. आरपी बालवान के अनुसार, गुरुग्राम और फरीदाबाद में सिर्फ खोड़ी जमालपुर क्षेत्र में ही खनन की अनुमति थी। इसी अनुमति की आड़ में अरावली के बड़े हिस्से में अवैध और अंधाधुंध खनन किया गया। इसके कारण हजारों गहरी खाइयां बन गईं और कई इलाकों में भूजल पूरी तरह समाप्त हो गया।
उनका कहना है कि 2000 से 2004 के बीच अवैध खनन चरम पर था। 18 मार्च 2004 को खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन इसके बावजूद गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल और खासकर नूंह जिले में आज भी अवैध खनन जारी है। महेंद्रगढ़, भिवानी और चरखी दादरी में भी नियमों के खिलाफ खनन की अनुमति दी गई।
प्रतिबंध के बाद माफिया के नए तरीके
खनन पर रोक लगने के बाद माफिया ने तरीके बदल लिए। शादी-ब्याह या बड़े आयोजनों के दौरान आतिशबाजी की आड़ में पहाड़ों में ब्लास्ट किए जाते हैं ताकि किसी को शक न हो। बाद में मौका पाकर डंपर और ट्रैक्टर से पत्थर उठा लिए जाते हैं।
इसके अलावा पहाड़ों के ऐसे हिस्सों पर चोट की जाती है, जहां से पत्थर आसानी से गिर जाएं। यह तरीका गुरुग्राम और फरीदाबाद क्षेत्र में सबसे ज्यादा अपनाया जा रहा है।
हथियारबंद माफिया, प्रशासन पर हमले
खनन माफिया के मुखबिर पहाड़ियों की ऊंचाइयों और प्रवेश मार्गों पर तैनात रहते हैं। जैसे ही वन, खनन या पुलिस विभाग की गाड़ी इलाके में पहुंचती है, तुरंत सूचना दे दी जाती है। माफिया के लोग हथियारों से लैस रहते हैं और कई बार सरकारी टीमों पर हमला कर चुके हैं।
तीन साल पहले तावड़ू में एक डीएसपी को कुचलकर मार दिया गया था, जबकि पुलिस और वन विभाग पर हमले की कई घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं।
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