मध्य प्रदेश में कुपोषण की गंभीर स्थिति: 45 जिले रेड जोन में, 10 लाख से अधिक बच्चे प्रभावित, एक और मासूम की मौत
मध्य प्रदेश में कुपोषण ने ली और बच्चों की जान, 45 जिले रेड जोन में
मध्य प्रदेश में कुपोषण की गंभीर समस्या ने एक और मासूम की जान ले ली। शनिवार को शिवपुरी की 15 महीने की दिव्यांशी जिला अस्पताल में दम तोड़ गई। उसका वजन मात्र 3.7 किलो था। कुपोषण अभियान “दस्तक” के तहत पहले ही चिन्हित होने के बावजूद उसका हीमोग्लोबिन केवल 7.4 ग्राम/डीएल था, जो जीवन के लिए खतरनाक माना जाता है। डॉक्टरों ने बार-बार परिवार को पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में भर्ती कराने की सलाह दी, लेकिन दिव्यांशी की मां का आरोप है कि ससुरालवालों ने बेटी होने के कारण इलाज नहीं करवाया।
कुछ दिन पहले श्योपुर की डेढ़ साल की राधिका का निधन हुआ था, जिसका वजन केवल 2.5 किलो था, जबकि इस उम्र में औसत वजन 10–11.5 किलो होना चाहिए। भिंड जिले के लहार अस्पताल में भी जुलाई में एक और मासूम की मौत हुई।
सरकारी आंकड़े
विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, 2020 से जून 2025 तक आदिवासी विकास खंडों में 85,330 बच्चों को NRC में भर्ती किया गया। 2020–21 में 11,566 बच्चे भर्ती हुए, 2024–25 में संख्या बढ़कर 20,741 हुई, और 2025–26 के पहले तीन महीनों में 5,928 बच्चों का इलाज किया जा चुका है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, प्रदेश में 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें 1.36 लाख गंभीर रूप से कमजोर हैं।
अप्रैल 2025 में राष्ट्रीय स्तर पर 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में गंभीर और मध्यम कुपोषण का औसत 5.40% था, जबकि मध्य प्रदेश में यह दर 7.79% रही।
रेड जोन की स्थिति
केंद्र के न्यूट्रिशन ट्रैकर ऐप के अनुसार, मई 2025 में प्रदेश के 55 जिलों में से 45 जिले “रेड जोन” में थे, जहां 20% से अधिक बच्चे अपनी उम्र के अनुसार बेहद कम वजन के हैं।
कागजों पर NRC में प्रति बच्चा 980 रुपए खर्च किए जाते हैं। आंगनवाड़ियों में सामान्य बच्चों के लिए 8 रुपए और गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के लिए 12 रुपए प्रतिदिन का प्रावधान है।
कांग्रेस विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा, “12 रुपए में दो केले भी नहीं आते। दूध 70 रुपए प्रति लीटर है। 8 रुपए में क्या पोषण मिलेगा? हकीकत यह है कि राज्य सरकार अपना एक रुपया भी खर्च नहीं करती, पूरा पैसा केंद्र से आता है।”
भ्रष्टाचार और सप्लाई की समस्याएँ
कमजोर वित्तीय प्रावधान के अलावा भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा है। 2022 में पोषण आहार की आपूर्ति और परिवहन में बड़े घोटाले का खुलासा हुआ। हाल ही में CAG ने पुष्टि की कि इसमें 858 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ, लेकिन किसी पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार, पोषण आहार अक्सर लाभार्थियों तक नहीं पहुंचता। आपूर्ति रास्ते में गायब हो जाती है, आंगनवाड़ी केंद्र अनियमित रहते हैं और जमीनी कार्यकर्ता जवाबदेह नहीं हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया कहती हैं, “हम लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं। मांडला, देवास और झाबुआ में अच्छे नतीजे आए हैं। माताओं को जागरूक किया जा रहा है। हमें विश्वास है कि आने वाले समय में हालात सुधरेंगे।”
दिव्यांशी, राधिका और भिंड के मासूम—ये केवल तीन नाम नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक हैं, जो छोटे बच्चों को पोषक आहार तक पहुंचाने में असफल रही है।
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