नमो–नीतीश गठजोड़ ने बदला बिहार का सत्ता समीकरण
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए ने बिहार विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। गठबंधन ने 202 सीटों पर कब्जा किया। भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि जदयू ने प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए 85 सीटें जीतीं—जो पिछली बार के मुकाबले लगभग दोगुनी हैं। यह परिणाम 2010 के रिकॉर्ड जनादेश (206 सीटें) के बेहद करीब माना जा रहा है।
बीस वर्षों की सत्ता-विरोधी लहर भी इस बार एनडीए को छू नहीं पाई। इसके उलट, महागठबंधन को जोरदार झटका लगा। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री और मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने की रणनीति भी कारगर साबित नहीं हुई। वीआईपी एक भी सीट नहीं जीत सकी। नवगठित इंडियन इंक्लूसिव पार्टी से केवल उसके संस्थापक आई.पी. गुप्ता ही जीत पाए। जन सुराज पार्टी के सभी 240 उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। दूसरी तरफ लोजपा (रा) ने अप्रत्याशित प्रदर्शन किया—28 में से 19 सीटों पर जीत दर्ज की। तीन वाम दलों को भी निराशा हाथ लगी।
सुशासन और विकास बने निर्णायक मुद्दे
एनडीए की भारी जीत का आधार सुशासन और विकास की वह छवि रही, जिसे भाजपा–जदयू ने मिलकर वर्षों में तैयार किया।
लोजपा (रा), हम और रालोमो जैसे सहयोगी दलों ने सामाजिक समीकरण को और मजबूत किया, वहीं “डबल इंजन सरकार” के स्थिर नेतृत्व पर भरोसे ने व्यापक जनसमर्थन जुटाया।
महागठबंधन हालांकि बेरोज़गारी, पलायन और कथित वोट चोरी के मुद्दों को उभारता रहा, लेकिन स्पष्ट रोडमैप न होने और कमजोर नैरेटिव के कारण वह मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाया। एनडीए ने 2005 से पहले के ‘जंगलराज’ को लगातार चुनावी विमर्श में बनाए रखा, जिससे बेहतर कानून-व्यवस्था की छवि और मजबूत हुई।
महिला वोट और युवा निर्णायक साबित हुए
इस चुनाव में महिला वोट निर्णायक रहा। शिक्षा, नौकरी, सुरक्षा, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़े कार्यक्रमों का सीधा लाभ महिलाओं को मिला, जिसे उन्होंने वोट में तब्दील किया।
पहली बार वोट करने वाले युवा, नौकरी और स्टार्टअप की संभावनाओं को लेकर “डबल इंजन मॉडल” पर ज्यादा भरोसा दिखाते नजर आए।
बदलते सामाजिक समीकरणों को एनडीए ने सही समय पर पहचाना, वहीं महागठबंधन पारंपरिक वोट बैंक की सीमा में ही उलझा रह गया।
महागठबंधन की हार: आंतरिक उलझनें और रणनीति की कमी
महागठबंधन की पराजय केवल सीटों का अंतर नहीं, बल्कि कई स्तरों पर गंभीर कमियों का परिणाम है:
नेतृत्व और समन्वय का अभाव
सीट बंटवारे, चेहरे की घोषणा और आपसी सामंजस्य की कमी ने गठबंधन की विश्वसनीयता कमजोर की। चुनाव अभियान के दौरान भी साझेदारी में स्पष्ट तालमेल नजर नहीं आया।
चुनावी एजेंडा को लेकर असफलता
रोजगार-महंगाई जैसे मुद्दे उठाए गए, लेकिन ठोस योजना और विश्वसनीय समाधान नहीं दिख सके। एनडीए ने आक्रामक तरीके से विकास और सुरक्षा का नैरेटिव गढ़ा, जिसे जनता ने स्वीकार किया।
उम्मीदवार चयन और संगठन की कमजोरी
कई सीटों पर गलत उम्मीदवारों के चयन, बूथ प्रबंधन की कमज़ोरी और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं ने महागठबंधन की स्थिति बिगाड़ी। कांग्रेस की कमजोर ग्राउंड मशीनरी भारी साबित हुई।
जातीय समीकरण पर अत्यधिक निर्भरता
महागठबंधन नए सामाजिक बदलावों को समझने में चूक गया। महिलाएँ और युवा निर्णायक बन चुके थे, लेकिन गठबंधन इनके लिए स्पष्ट रणनीति नहीं बना सका।
कांग्रेस बनी कमजोर कड़ी
टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक कांग्रेस हर स्तर पर कमजोर रही। राजद–कांग्रेस के बीच सीट साझा करने की खींचतान लगातार बनी रही, जिससे संयुक्त लड़ाई बिखरी हुई दिखी।
मजबूत नेतृत्व, जमीनी रणनीति और स्पष्ट विज़न से मिली एनडीए को जीत
और यही वे तत्व थे, जिनकी कमी महागठबंधन की हार का मूल कारण बनी।
भविष्य में वापसी के लिए महागठबंधन को नेतृत्व, संगठन, रणनीति और नैरेटिव—चारों मोर्चों पर बड़े स्तर पर सुधार करना होगा।
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