ईरान-इजरायल युद्ध ने पश्चिम एशिया की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस टकराव में इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu घरेलू स्तर पर मजबूत होते दिख रहे हैं, जबकि Donald Trump और खाड़ी देशों के सामने रणनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ गया है।
नेतन्याहू की मजबूत होती स्थिति
इजरायल में इस युद्ध को ‘अस्तित्व की लड़ाई’ के रूप में पेश किया जा रहा है। इससे देश का फोकस गाजा से हटकर सीधे ईरान पर आ गया है, जहां नेतन्याहू को व्यापक समर्थन मिल रहा है। सख्त सैन्य रुख ने उनकी राजनीतिक स्थिति को फिलहाल मजबूत किया है।
ट्रंप की रणनीति उलझी
अमेरिका ने दबाव की नीति से ईरान को झुकाने की कोशिश की थी, लेकिन ईरान के कड़े प्रतिरोध ने हालात बदल दिए। अब Donald Trump एक ऐसे संघर्ष में फंसे नजर आते हैं, जहां से निकलने का रास्ता आसान नहीं दिख रहा।
अमेरिकी खुफिया प्रमुख Tulsi Gabbard के मुताबिक, ईरान कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन अब भी जवाबी हमले की क्षमता रखता है।
खाड़ी देशों की बढ़ी चिंता
Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव ने खाड़ी देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल इसी मार्ग से गुजरता है, ऐसे में किसी भी बाधा से वैश्विक कीमतों में उछाल तय है।
खाड़ी देश, जो खुद को भविष्य के आर्थिक हब के रूप में देख रहे हैं, अब सुरक्षा और स्थिरता को लेकर दबाव में हैं।
सैन्य बढ़त, लेकिन मतभेद भी
इजरायल ने ईरान से जुड़े कई अहम ठिकानों को निशाना बनाकर अपनी सैन्य क्षमता दिखाई है। हालांकि, इस दौरान अमेरिका और इजरायल के बीच तालमेल को लेकर सवाल भी उठे हैं—खासतौर पर कुछ हमलों की जानकारी को लेकर दिए गए बयानों के बाद।
आगे की तस्वीर
विशेषज्ञ मानते हैं कि Benjamin Netanyahu की यह बढ़त स्थायी होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्ध कितने समय तक चलता है और इसका नतीजा क्या निकलता है। लंबा खिंचा संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
कुल मिलाकर, यह युद्ध अब सिर्फ दो देशों का टकराव नहीं रहा, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संतुलन को प्रभावित करने वाला बड़ा संकट बन चुका है।
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