“SC में दलील: धार्मिक परंपराओं की सीमा तय करना न्यायपालिका का काम नहीं”

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सबरीमला केस: ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ तय करना अदालत का काम नहीं — मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की SC में दलील

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने Supreme Court of India में दाखिल अपनी लिखित दलीलों में कहा है कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ है। बोर्ड के मुताबिक, यह धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में आता है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू करेगी।

2018 फैसले से जुड़ा मामला

यह मामला 2018 के सबरीमला फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं से जुड़ा है। उस फैसले में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। बाद में 2019 में शीर्ष अदालत ने इससे जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों को बड़ी पीठ के पास भेज दिया था।

‘Essential Religious Practice’ तय करना जटिल

बोर्ड ने कहा कि किसी धर्म की ‘आवश्यक’ प्रथाओं का निर्धारण बेहद जटिल और आस्था-आधारित विषय है। इसे अदालतों की बजाय धार्मिक विद्वानों और संबंधित समुदाय पर छोड़ना अधिक उचित होगा।

बोर्ड का यह भी तर्क है कि इस परीक्षण के चलते लोगों पर यह बोझ आ जाता है कि वे साबित करें कि कोई प्रथा उनके धर्म के लिए अनिवार्य है, जो न्यायसंगत नहीं है।

नैतिकता बनाम आस्था नहीं, संतुलन जरूरी

दलील में कहा गया है कि नैतिकता को केवल संवैधानिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि संबंधित धर्म की मान्यताओं को भी महत्व दिया जाना चाहिए—बशर्ते वे संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ न हों।

बोर्ड ने यह भी कहा कि महिला अधिकार और धार्मिक आस्था को टकराव की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि दोनों साथ-साथ अस्तित्व में रह सकते हैं।

समानता का मतलब एकरूपता नहीं

बोर्ड के अनुसार, सभी धर्मों पर एक जैसा नियम लागू करना हमेशा समानता नहीं लाता, क्योंकि हर धर्म की अपनी विशिष्ट परंपराएं होती हैं।

इसलिए ‘पब्लिक ऑर्डर’ या सेक्युलर कानूनों के नाम पर धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप केवल ठोस और जरूरी परिस्थितियों में ही होना चाहिए।

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