नेपाल सरकार का कड़ा कदम, पूर्व व वर्तमान नेताओं की संपत्ति की न्यायिक जांच होगी

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नेपाल में नई सरकार ने ‘सफेदपोश’ भ्रष्टाचार पर बड़ी कार्रवाई करते हुए एक पांच सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है, जो पिछले दो दशकों में सत्ता में रहे नेताओं और अधिकारियों की संपत्तियों की जांच करेगा।

किन-किन पर होगी जांच?

आयोग 2006 में राजतंत्र समाप्त होने के बाद से लेकर वित्तीय वर्ष 2025-26 तक सार्वजनिक पदों पर रहे सभी लोगों की संपत्तियों की जांच करेगा। इसमें पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह, पूर्व राष्ट्रपति राम बरन यादव और विद्या देवी भंडारी, मौजूदा राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के साथ-साथ कई पूर्व प्रधानमंत्रियों को भी शामिल किया गया है।

जांच के दायरे में पुष्प कमल दहल, माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल, बाबूराम भट्टराई, केपी शर्मा ओली और शेर बहादुर देउबा जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

सरकार ने दायरा क्यों बढ़ाया?

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने आयोग का दायरा इतना व्यापक रखा है कि इसमें मौजूदा मंत्री, स्पीकर और यहां तक कि सत्तारूढ़ दल के नेता भी जांच के घेरे में आ सकते हैं।

खास बात यह है कि जांच मृत नेताओं तक भी पहुंचेगी, जिससे उनके परिवारों और राजनीतिक उत्तराधिकारियों की संपत्तियों की भी पड़ताल होगी।

कब और क्यों बना आयोग?

यह आयोग 2025 के चुनाव में सरकार की जीत के बाद गठित किया गया, जो देश में युवाओं के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद हुआ था।

जांच कैसे होगी?

सरकार का कहना है कि जांच पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया और सबूतों के आधार पर की जाएगी। आयोग की अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज राजेंद्र कुमार भंडारी कर रहे हैं और इसकी सिफारिशों को लागू करने की जिम्मेदारी सरकारी एजेंसियों की होगी।

क्या है इसका बड़ा संदेश?

यह कदम नेपाल में लोकतंत्र आने के बाद पहली बार इतनी व्यापक स्तर पर नेताओं और अधिकारियों की संपत्ति की जांच का संकेत देता है। साफ है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती दिखाते हुए बड़े और प्रभावशाली चेहरों को भी जांच के दायरे में लाना चाहती है।

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