RSS मुख्यालय वाले नागपुर में BJP को झटका, कांग्रेस की जीत के पीछे ये 5 वजहें

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RSS के गढ़ नागपुर में BJP को क्यों मिली शिकस्त? कांग्रेस की जीत के पीछे ये 5 वजहें

महाराष्ट्र की राजनीति में नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की विधान परिषद सीट का नतीजा कई मायनों में अहम रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय होने के कारण नागपुर को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन यहां कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने जीत दर्ज कर पार्टी को बड़ा झटका दिया। वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोल्हे को 3,271 मतों से हराकर लगातार दूसरी बार इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार रखा।

शुरुआती मतगणना में भाजपा उम्मीदवार आगे दिखाई दे रहे थे, लेकिन दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती ने पूरा चुनावी समीकरण बदल दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा अपने मजबूत राजनीतिक आधार पर भी जीत हासिल नहीं कर सकी? आइए समझते हैं कांग्रेस की जीत के पांच प्रमुख कारण।

1. दूसरी वरीयता के वोटों ने पलट दिया पासा
नागपुर स्नातक सीट पर जीत के लिए निर्धारित कोटा 75,438 वोट था। पहली वरीयता की गिनती में कोई भी उम्मीदवार इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया। इसके बाद दूसरी वरीयता के मतों की गणना की गई। इस चरण में अभिजीत वंजारी को बढ़त मिली और वह भाजपा उम्मीदवार को पीछे छोड़ने में सफल रहे। अंततः उन्होंने 3,271 मतों से जीत हासिल की।

2. निर्दलीय उम्मीदवार के वोट बने निर्णायक
निर्दलीय उम्मीदवार नीलेश मास्टर को पहली वरीयता में 24,249 वोट मिले। जीत का कोटा पूरा नहीं होने के बाद उनके मतपत्रों पर दर्ज दूसरी वरीयता को भी गिना गया। बताया गया कि इन मतपत्रों में बड़ी संख्या में दूसरी पसंद अभिजीत वंजारी थे। इससे कांग्रेस उम्मीदवार को निर्णायक बढ़त बनाने में मदद मिली।

3. भाजपा की अंदरूनी नाराजगी ने बढ़ाई मुश्किल
भाजपा के उम्मीदवार सुधाकर कोल्हे के चयन को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें सामने आईं। पूर्व विधायक अनिल सोले की बगावती भूमिका ने स्थानीय संगठन के सामने चुनौती खड़ी कर दी। चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं और पार्टी के अलग-अलग गुटों के बीच तालमेल की कमी का असर प्रचार अभियान पर भी पड़ा।

4. बूथ मैनेजमेंट में पिछड़ी भाजपा
भाजपा का मजबूत बूथ नेटवर्क उसकी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। हालांकि, नागपुर में पार्टी को इसी मोर्चे पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा। स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और कार्यकर्ताओं की नाराजगी के चलते कई मतदान केंद्रों पर संगठन की सक्रियता प्रभावित हुई। वहीं कांग्रेस ने मतदाताओं से संपर्क और अपने समर्थन को बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किया।

5. वंजारी के लगातार जनसंपर्क ने दिलाई बढ़त
अभिजीत वंजारी की जीत का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका लगातार जमीनी संपर्क रहा। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान विदर्भ के स्नातक मतदाताओं के बीच सक्रियता बनाए रखी। मतदाताओं से नियमित संवाद और उनकी समस्याओं को उठाने की कोशिश ने उनके पक्ष में माहौल बनाने में भूमिका निभाई। इसके मुकाबले भाजपा का हाई-प्रोफाइल प्रचार अभियान अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका।

15 हजार से ज्यादा मतपत्र अमान्य
इस चुनाव में अमान्य मतपत्रों की संख्या भी चर्चा का विषय रही। कुल 1,65,906 मतपत्रों में से 15,032 अमान्य घोषित किए गए। यानी लगभग हर 11 मतदाताओं में से एक का मतपत्र गलत तरीके से भरे जाने के कारण रद्द हो गया। यह संख्या 2020 के चुनाव में दर्ज 11,540 अमान्य मतों के पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक थी।

नागपुर का चुनावी नतीजा बताता है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र जैसे चुनावों में केवल पहली वरीयता के वोट ही नहीं, बल्कि दूसरी पसंद, उम्मीदवार की व्यक्तिगत सक्रियता और संगठनात्मक एकजुटता भी महत्वपूर्ण होती है। भाजपा की अंदरूनी चुनौतियों और दूसरी वरीयता के वोटों के समीकरण ने इस मुकाबले को निर्णायक मोड़ दिया।

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