SIR पर सियासत तेज, 13 करोड़ नामों का मुद्दा कितना बड़ा? आंकड़ों में करीब 3 करोड़ मतदाताओं की जांच बाकी
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। विपक्ष लगातार चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है और मतदाता सूची से बाहर हुए या अतिरिक्त दस्तावेजों के लिए नोटिस पाए लोगों को लेकर सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर, SIR से जुड़े आंकड़ों की अलग-अलग व्याख्या को लेकर भी बहस जारी है।
राजनीतिक बहस में करीब 13.3 करोड़ नामों का आंकड़ा प्रमुखता से सामने आ रहा है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि इन सभी लोगों की स्थिति एक जैसी नहीं है। इनमें ऐसे नाम भी शामिल हैं जिन्हें मृत, डुप्लीकेट या स्थायी रूप से स्थानांतरित माना गया है, जबकि एक हिस्से के मामलों में अभी सत्यापन या दस्तावेजों की प्रक्रिया बाकी है।
13 करोड़ नामों की पूरी तस्वीर क्या है?
SIR से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, करीब 2.8 करोड़ ऐसे नाम सामने आए जिन मतदाताओं की पिछले दो दशकों में मृत्यु हो चुकी बताई गई है। इसके अलावा एक करोड़ से अधिक नाम एक से ज्यादा स्थानों पर दर्ज पाए गए, जिन्हें डुप्लीकेट श्रेणी में रखा गया।
करीब 6.5 करोड़ मतदाताओं के स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले जाने की बात भी सामने आई है। वहीं, चुनाव आयोग के अनुसार लगभग तीन करोड़ लोग SIR के दौरान अपने दर्ज पते पर मौजूद नहीं मिले। कुछ अन्य मतदाता ऐसे भी हैं जिन्हें जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाने के कारण नोटिस जारी किया गया।
इस तरह 13 करोड़ से अधिक नामों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। अलग-अलग कारणों से सामने आए इन नामों में एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसकी स्थिति आयोग के रिकॉर्ड में अलग आधार पर दर्ज की गई है।
करीब तीन करोड़ मामलों में दोबारा जांच
चुनाव आयोग ने 20 राज्यों में उन मतदाताओं की दोबारा जांच कराने की बात कही है जिन्हें नोटिस जारी किया गया था या जिनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किए गए। इस प्रक्रिया में संबंधित लोगों को अपनी पात्रता और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
यही वजह है कि SIR के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दावों और वास्तविक प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। 13 करोड़ का कुल आंकड़ा उन सभी लोगों की संख्या नहीं बताता जिनका नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटाया जाना तय है।
सुप्रीम कोर्ट में भी हुई थी लंबी सुनवाई
बिहार में 24 जून 2025 को SIR कराने की चुनाव आयोग की अधिसूचना के बाद इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने इसे असंवैधानिक बताते हुए प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में लंबी सुनवाई की, लेकिन SIR पर रोक नहीं लगाई। हालांकि, अदालत ने प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और आम मतदाताओं के लिए आसान बनाने के लिए कई प्रक्रियात्मक निर्देश दिए। बाद में पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ा मामला भी अदालत पहुंचा, लेकिन वहां भी प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई गई।
27 मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने SIR से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया। इनमें चुनाव आयोग की SIR कराने की शक्ति, प्रक्रिया का उद्देश्य, अपनाई गई प्रक्रिया की वैधानिकता और जनप्रतिनिधित्व कानून तथा मतदाता पंजीकरण नियमों के साथ उसकी संगतता शामिल थी।
अदालत ने माना कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने का अधिकार है। साथ ही, मतदाता सूची में नाम शामिल करने या बनाए रखने के संदर्भ में आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है।
SIR पर विवाद अभी खत्म नहीं
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद SIR से जुड़े सभी विवाद समाप्त नहीं हुए हैं। अदालत में प्रक्रिया की अलग-अलग व्यवस्थाओं और कार्यान्वयन से जुड़े मामले अभी भी विचाराधीन हैं।
इस बीच राजनीतिक बहस में 13 करोड़ के आंकड़े को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कुल चिन्हित नामों और उन मामलों में बड़ा अंतर है जिनमें मतदाता की पात्रता पर अंतिम फैसला होना बाकी है। आयोग की दोबारा जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इस हिस्से की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
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