आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता इस्तेमाल अब वैज्ञानिक शोध जगत के लिए नई चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।
एक बड़े ऑडिट में खुलासा हुआ है कि हजारों बायोमेडिकल रिसर्च पेपर्स में ऐसे वैज्ञानिक रेफरेंस दिए गए, जिनका वास्तविकता में कोई अस्तित्व नहीं है। यानी एआई की मदद से तैयार किए गए फर्जी संदर्भों को असली शोध सामग्री की तरह पेश किया गया। यह जांच अमेरिका के National Institutes of Health द्वारा संचालित पबमेड सेंट्रल ओपन एक्सेस डेटाबेस में प्रकाशित रिसर्च पेपर्स पर की गई। जनवरी 2023 से फरवरी 2026 के बीच प्रकाशित करीब 25 लाख शोध पत्रों का ऑडिट किया गया।
इस अध्ययन की रिपोर्ट प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित हुई है। जांच में कुल 9.71 करोड़ सत्यापित रेफरेंस का विश्लेषण किया गया, जिनमें 4046 संदर्भ पूरी तरह फर्जी पाए गए। ये नकली रेफरेंस 2810 रिसर्च पेपर्स में इस्तेमाल किए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, 2023 की तुलना में फर्जी वैज्ञानिक संदर्भों के मामलों में 12 गुना से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं ने बताया कि 2024 के मध्य से ऐसे मामलों में अचानक तेजी आई, जिसका संबंध एआई राइटिंग टूल्स के बढ़ते इस्तेमाल से माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक कई एआई टूल्स ऐसे रेफरेंस तैयार कर देते हैं जो पढ़ने में पूरी तरह असली लगते हैं, लेकिन वैज्ञानिक डेटाबेस में उनका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं होता। इससे रिसर्च की विश्वसनीयता और अकादमिक गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि एआई आधारित कंटेंट की जांच के लिए सख्त मानक नहीं बनाए गए, तो फर्जी वैज्ञानिक जानकारी तेजी से शोध जगत में फैल सकती है और इससे भविष्य के अनुसंधानों पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
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