ईरान-समझौते का बड़ा असर, होर्मुज खुलते ही वैश्विक तेल बाजार को राहत

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समझौते की लीक कॉपी से बड़ा खुलासा, होर्मुज खोलेगा ईरान; तेल निर्यात पर मिल सकती है पूरी छूट

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए प्रस्तावित अंतरिम समझौते की कथित तौर पर लीक हुई प्रतियों से कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। दस्तावेजों के अनुसार, समझौते के लागू होते ही ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने की दिशा में कदम उठाएगा। इसके बदले तेहरान को वैश्विक बाजार में बिना किसी बड़ी बाधा के तेल बेचने की अनुमति मिलने की संभावना है।

ई-हस्ताक्षर के बाद औपचारिक समझौते की तैयारी

रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच इस अंतरिम समझौते पर सोमवार को सहमति बनी और दोनों पक्षों ने इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर भी कर दिए। अब शुक्रवार को जिनेवा में इसके औपचारिक हस्ताक्षर होने की बात कही जा रही है।

पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक की सहायता

लीक दस्तावेजों के अनुसार, युद्ध के बाद ईरान के पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता और निवेश उपलब्ध कराने की व्यवस्था शामिल हो सकती है। साथ ही अमेरिका, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम समझौता होने के बाद उस पर लगे अमेरिकी और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को हटाने की दिशा में काम करेगा।

तेल निर्यात पर सबसे बड़ी राहत

समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईरान को तेल निर्यात में मिलने वाली संभावित छूट माना जा रहा है। प्रस्ताव के तहत तेहरान को तत्काल प्रभाव से तेल बेचने की व्यापक स्वतंत्रता मिल सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि यह रियायत 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) के तहत मिली सुविधाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। उनका कहना था कि इसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है। बाद में 7 अप्रैल को युद्धविराम लागू हुआ, जिसके बाद कूटनीतिक वार्ताओं का दौर शुरू हुआ।

लेबनान और हिजबुल्ला का मुद्दा अब भी संवेदनशील

लीक हुई प्रतियों के अनुसार, समझौते में दुश्मनी खत्म करने, होर्मुज को खोलने और अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता बहाल करने पर जोर दिया गया है। हालांकि लेबनान में इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्ला से जुड़े विवादित मुद्दों पर स्पष्ट सहमति नजर नहीं आती। इजरायल सुरक्षा कारणों से अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने की बात कहता रहा है, जबकि ईरान वहां से पूर्ण वापसी की मांग करता है।

यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया की राजनीति पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी व्यापक रूप से पड़ सकता है।

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