चीनी के दाम में उछाल के पीछे क्या है वजह? एथनॉल नीति, अल नीनो और घटता गन्ना रकबा चर्चा में

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देश में चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने एथनॉल नीति से लेकर गन्ने के घटते उत्पादन तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

विपक्ष जहां पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को चीनी की कमी और महंगाई से जोड़ रहा है, वहीं सरकार और उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे मौसम, घटता गन्ना रकबा, कम उत्पादन और बाजार में स्टॉकिंग समेत कई कारण हैं।

एथनॉल पर क्यों उठ रहे सवाल?

विपक्ष का आरोप है कि एथनॉल की बढ़ती मांग के चलते गन्ने का एक हिस्सा चीनी के बजाय ईंधन उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इससे घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतें बढ़ीं।

हालांकि, चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। पश्चिम भारत चीनी मिल संघ के अध्यक्ष भैरवनाथ थोंब्रे के मुताबिक, एथनॉल को चीनी की मौजूदा महंगाई का मुख्य कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि अब एथनॉल उत्पादन में अनाज की हिस्सेदारी भी काफी बढ़ गई है।

अल नीनो और कम बारिश का असर

केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी ने चीनी उत्पादन में कमी के लिए मौसम को प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार, रेड रॉट बीमारी और अल नीनो के प्रभाव से कम बारिश हुई, जिससे गन्ने की फसल प्रभावित हुई और पैदावार घट गई।

जोशी ने कहा कि अल नीनो का असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ। सरकार आगामी त्योहारी सीजन में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए अस्थायी चीनी आयात समेत कई कदम उठा रही है।

सरकार के अनुसार देश में सालाना करीब 280 लाख टन चीनी की खपत होती है, जबकि फिलहाल 20-25 लाख टन का सरप्लस उपलब्ध है।

घटता गन्ना रकबा भी चिंता का कारण

महाराष्ट्र के पूर्व गन्ना आयुक्त शेखर गायकवाड़ के मुताबिक, देश में गन्ने की खेती का रकबा लगातार घट रहा है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में करीब 59 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती हुई थी, जो 2024-25 में घटकर लगभग 54.5 लाख हेक्टेयर रह गई।

इसी अवधि में गन्ने का उत्पादन करीब 49 करोड़ टन से घटकर 45.3 करोड़ टन रह गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, रकबे और उत्पादन में गिरावट का असर चीनी की उपलब्धता पर पड़ना स्वाभाविक है।

गायकवाड़ का कहना है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए बनाई गई किसी भी नई नीति का असर तुरंत नहीं दिखेगा। गन्ने की खेती और चीनी उत्पादन में सुधार के लिए कम से कम तीन साल का समय लग सकता है।

चीनी मिलों का पेराई सत्र भी घटा

कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज की नेशनल फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने महाराष्ट्र में चीनी मिलों के छोटे होते पेराई सत्र को भी महत्वपूर्ण वजह बताया।

उनके अनुसार, जिन मिलों में पहले करीब 150 दिनों तक गन्ने की पेराई होती थी, वहां अब यह अवधि घटकर करीब 100 दिन रह गई है। इससे चीनी उत्पादन की क्षमता पर असर पड़ रहा है।

कम उत्पादन के साथ निर्यात और स्टॉकिंग का असर

भैरवनाथ थोंब्रे के मुताबिक, शुरुआत में इस सीजन में करीब 390 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था, लेकिन वास्तविक उत्पादन लगभग 310 लाख टन ही रहा। यानी अनुमान से करीब 80 लाख टन कम चीनी बनी।

कम उत्पादन के बावजूद करीब आठ लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई। इसके अलावा मौसम को लेकर आशंकाओं के बीच व्यापारियों द्वारा बड़े पैमाने पर स्टॉक किए जाने से भी घरेलू बाजार में उपलब्धता पर दबाव बढ़ा।

चीनी महंगी होने की एक वजह नहीं

चीनी की मौजूदा महंगाई को केवल एथनॉल नीति से जोड़ना तस्वीर का एक हिस्सा भर है। गन्ने का घटता रकबा, कम उत्पादन, मौसम का असर, छोटा पेराई सत्र, निर्यात और बाजार में स्टॉकिंग जैसे कई कारक मिलकर कीमतों पर दबाव बना रहे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में कीमतों की दिशा सरकार के कदमों और घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।

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