आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है और इसके साथ ही दुनिया की बड़ी शक्तियों की नजर इस क्षेत्र पर और गहरी होती जा रही है।
जलवायु परिवर्तन ने नए समुद्री मार्गों और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच की संभावनाएं बढ़ाई हैं, लेकिन इसी के साथ रूस की सैन्य गतिविधियों, चीन की बढ़ती आर्थिक दिलचस्पी और समुद्री बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर यूरोप की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
इन्हीं चुनौतियों और संभावनाओं पर चर्चा के लिए 13-14 सितंबर को फिनलैंड के रोवानिएमी में यूरोपीय आर्कटिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में यूरोपीय देशों ने बदलते आर्कटिक और उससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों पर साझा रणनीति की जरूरत पर जोर दिया।
फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेट्टेरी ओर्पो ने कहा कि आर्कटिक अब यूरोप के सुरक्षा वातावरण का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री नौवहन के नए रास्ते खुल रहे हैं और क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का महत्व बढ़ रहा है। हालांकि, इन अवसरों के साथ नई सुरक्षा चुनौतियां भी पैदा हो रही हैं।
आर्कटिक पर यूरोप क्यों बढ़ा रहा फोकस?
यूरोपीय नेताओं का मानना है कि बदलती परिस्थितियों में आर्कटिक को लेकर यूरोप को अधिक सक्रिय और एकजुट रणनीति अपनानी होगी। 12 यूरोपीय देशों ने भी यूरोपीय संघ से क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भूमिका मजबूत करने की अपील की है।
आर्कटिक में रूस की गतिविधियां यूरोप की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं। खासतौर पर समुद्र के नीचे मौजूद संचार केबलों और दूसरे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को लेकर आशंकाएं बढ़ी हैं।
नाटो देशों ने स्वालबार्ड के आसपास रूसी समुद्री गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई है। नाटो के मुताबिक, 2026 के वसंत में ब्रिटेन, नॉर्वे और अमेरिका ने एक रूसी समुद्री इकाई की गतिविधियों को रोकने के लिए कार्रवाई की थी। आशंका थी कि यह इकाई महत्वपूर्ण समुद्री केबलों के आसपास गतिविधियां कर रही थी।
स्वालबार्ड बना तनाव का नया केंद्र
स्वालबार्ड को लेकर रूस और नॉर्वे के बीच भी तनाव बढ़ा है। 2 सितंबर को नॉर्वे ने रूसी शोध पोत ‘प्रोफेसर मोलचानोव’ को जब्त किया था। बताया गया कि यह कार्रवाई यूक्रेनी कंपनी नाफ्टोगाज को मिले अरबों डॉलर के मुआवजे की वसूली से जुड़ी थी।
रूस ने नॉर्वे के कदम को ‘समुद्री डकैती’ करार दिया। इस घटनाक्रम ने आर्कटिक में दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।
पिघलती बर्फ से खुल रहे नए रास्ते
आर्कटिक का महत्व केवल सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं है। बढ़ते तापमान और तेजी से घटती समुद्री बर्फ के कारण ऐसे समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जिनका इस्तेमाल भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बढ़ सकता है।
इसके अलावा, आर्कटिक में तेल, गैस और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की बड़ी संभावनाएं हैं। बर्फ के पीछे छिपे इन संसाधनों तक पहुंच की होड़ ने इस क्षेत्र को आर्थिक और रणनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण बना दिया है।
चीन भी आर्कटिक में अपनी आर्थिक और कारोबारी मौजूदगी बढ़ाने में दिलचस्पी दिखा रहा है। ऐसे में रूस, चीन और पश्चिमी देशों के हितों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका है।
जलवायु संकट से भू-राजनीतिक चुनौती तक
आर्कटिक का बदलता स्वरूप दुनिया के लिए दोहरी चुनौती लेकर आया है। एक ओर ग्लोबल वार्मिंग इस संवेदनशील क्षेत्र के पर्यावरण को तेजी से बदल रही है, तो दूसरी ओर पिघलती बर्फ ने इसे रणनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का नया मैदान बना दिया है।
यूरोप के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि वह पर्यावरण संरक्षण के साथ अपनी ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा जरूरतों को कैसे संतुलित करे। रूस की सैन्य गतिविधियों और चीन की बढ़ती दिलचस्पी के बीच आर्कटिक आने वाले वर्षों में वैश्विक भू-राजनीति का एक अहम केंद्र बन सकता है।
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