फर्जी वकीलों पर लगाम की मांग, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री का मामला

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फर्जी वकीलों पर चिंता, सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग पर सुनवाई

देश में कानूनी पेशे की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर उठे एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। मामला देशभर के वकीलों के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री स्थापित करने की मांग से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य अधिवक्ताओं का सत्यापित और एकीकृत रिकॉर्ड तैयार करना है।

याचिका में प्रस्ताव दिया गया है कि प्रत्येक पंजीकृत वकील को एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान संख्या (National Advocate Identifier) दी जाए। इसके जरिए अधिवक्ताओं की पहचान, पंजीकरण और पेशेवर स्थिति का डिजिटल सत्यापन संभव हो सकेगा, जिससे कथित फर्जी या अनधिकृत प्रैक्टिस करने वालों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पक्षकारों का जवाब

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और वी. मोहन की पीठ ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कहा कि यह एक नवोन्मेषी सुझाव प्रतीत होता है और आधुनिक तकनीक की मदद से इसे लागू करने की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है।

पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और अन्य संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया मांगी है।

बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने उठाया मुद्दा

यह याचिका बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया की ओर से दायर की गई है। याचिका में कानूनी पेशे में सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करने और अधिवक्ताओं के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस तैयार करने की मांग की गई है।

साथ ही, याचिकाकर्ता ने बीसीआई को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49 के तहत सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वकीलों के आचरण को विनियमित करने के लिए एक डिजिटल आचार संहिता तैयार करने का निर्देश देने की भी मांग की है।

क्या होगा डिजिटल रजिस्ट्री का फायदा?

प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर देश के सभी पंजीकृत वकीलों का एक केंद्रीकृत डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होगा। इससे अदालतों, मुवक्किलों और नियामक संस्थाओं को किसी भी अधिवक्ता की पहचान और पंजीकरण की स्थिति सत्यापित करने में आसानी होगी। समर्थकों का मानना है कि इससे पेशे में पारदर्शिता बढ़ेगी और अनधिकृत रूप से वकालत करने के मामलों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।

अब इस मामले में संबंधित पक्षों के जवाब और आगे की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी डिजिटल व्यवस्था लागू करने के लिए क्या दिशा-निर्देश दिए जाएं।

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